सूखी घास के ढेर को शरारा मुबारक हो,
अंधो को रोशनी का नजा़रा मुबारक हो।
किसने उँडेल दी है कालिख आसमाँ पर,
गर्दिश मे डुबता वो सितारा मुबारक हो।
पाँव निकल पडे तो रास्ते अपाहिज हो गये,
लो बैसाखियो का सहारा मुबारक हो।
फूलो के सर क़लम कर दिये पत्तो की धार ने,
अहल-ए-चमन को लहू का फुहारा मुबारक हो।
दो गज़ ज़मीन नसीब हो गयी यही बहुत है,
सिकंदरो को अब जहान सारा मुबारक हो।