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सूखी घास के ढेर को शरारा मुबारक हो,
अंधो को रोशनी का नजा़रा मुबारक हो।

किसने उँडेल दी है कालिख आसमाँ पर,
गर्दिश मे डुबता वो सितारा मुबारक हो।

पाँव निकल पडे तो रास्ते अपाहिज हो गये,
लो बैसाखियो का सहारा मुबारक हो।

फूलो के सर क़लम कर दिये पत्तो की धार ने,
अहल-ए-चमन को लहू का फुहारा मुबारक हो।

दो गज़ ज़मीन नसीब हो गयी यही बहुत है,
सिकंदरो को अब जहान सारा मुबारक हो।

ग़ज़ल /श्रीकृष्ण राऊत

हर मुश्किल का हल हो जैसे
आज नही तो कल हो जैसे

आबाद हो गयी दिल की दिल्ली
घर छोटासा, महल हो जैसे

महकी महकी बाते उसकी
पके आम के फल हो जैसे

सूना सूना लगे भीड मे
शहर नही जंगल हो जैसे

यही ठहरती सुई घडी की
तेरी याद का पल हो जैसे

मेरे ऐब भी प्यारे तुझको
तू माँ का आँचल हो जै

चाँद तन्हा है आसमां तन्हा,

दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा

बुझ गई आस छुप गया तारा,

थरथराता रहा धुँआ तन्हा

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं,

जिस्म तन्हा है और जान तन्हा

हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,

दोनों चलते रहें तन्हा तन्हा

जलती बुझती सी रोशनी के परे,

सिमटा सिमटा सा एक मकां तन्हा

राह देखा करेगा सदियॊं तक

छॊड़ जाएगें ये जहाँ तन्हा

अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ

 

कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ

 

थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ

 

छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रौशनी हो घर जलाना चाहता हूँ

 

आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया

 

आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया

 

दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया

 

तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया

 

फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया

 

हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए तब याद आया

 

बैठ कर साया-ए-गुल में “नासिर”
हम बहुत रोये वो जब याद आया

मिट्टी में मिला दे कि जुदा हो नहीं सकता

अब इससे ज़ियादा मैं तिरा हो नहीं सकता

दहलीज़ पे रख दी हैं किसी शख़्स ने आँखें

रौशन कभी इतना तो दिया हो नहीं सकता

बस तू मिरी आवाज़ में आवाज़ मिला दे

फिर देख कि इस शहर में क्या हो नहीं सकता

ऎ मौत मुझे तूने मुसीबत से निकाला

सय्याद समझता था रिहा हो नहीं सकता

इस ख़ाकबदन को कभी पहुँचा दे वहाँ भी

क्या इतना करम बादे-सबा हो नहीं सकता

पेशानी को सजदे भी अता कर मिरे मौला

आँखों से तो यह कर्ज़ अदा हो नहीं सकता

दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी बङी दौलत नहीं मिलती

कुछ लोग यूँही शहर में हमसे भी ख़फा हैं
हर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलती

देखा था जिसे मैंने कोई और था शायद
वो कौन है जिससे तेरी सूरत नहीं मिलती

हंसते हुए चेहरों से है बाज़ार की ज़ीनत
रोने को यहाँ वैसे भी फुरसत नहीं मिलती

चाँदनी छत पे चल रही होगी
अब अकेली टहल रही होगी

फिर मेरा ज़िक्र आ गया होगा
वो बर्फ़-सी पिघल रही होगी

कल का सपना बहुत सुहाना था
ये उदासी न कल रही होगी

सोचता हूँ कि बंद कमरे में
एक शम-सी जल रही होगी

तेरे गहनों सी खनखनाती थी
बाजरे की फ़सल रही होगी

जिन हवाओं ने तुझ को दुलराया
उन में मेरी ग़ज़ल रही होगी

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए,
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए।

आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी,
शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए।

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए।

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

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