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Archive for October 19th, 2007

चाँद तन्हा है आसमां तन्हा,
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा
बुझ गई आस छुप गया तारा,
थरथराता रहा धुँआ तन्हा
जिंदगी क्या इसी को कहते हैं,
जिस्म तन्हा है और जान तन्हा
हमसफ़र कोई गर मिले भी कभी,
दोनों चलते रहें तन्हा तन्हा
जलती बुझती सी रोशनी के परे,
सिमटा सिमटा सा एक मकां तन्हा
राह देखा करेगा सदियॊं तक
छॊड़ जाएगें ये जहाँ तन्हा

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अपने होठों पर सजाना चाहता हूँ
आ तुझे मैं गुनगुनाना चाहता हूँ
 
कोई आँसू तेरे दामन पर गिराकर
बूँद को मोती बनाना चाहता हूँ
 
थक गया मैं करते-करते याद तुझको
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ
 
छा रहा है सारी बस्ती में अँधेरा
रौशनी हो घर जलाना चाहता हूँ
 
आख़री हिचकी तेरे ज़ानों पे आये
मौत भी मैं शायराना चाहता हूँ

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दिल धड़कने का सबब याद आया
वो तेरी याद थी अब याद आया
 
आज मुश्किल था सम्भलना ऐ दोस्त
तू मुसीबत में अजब याद आया
 
दिन गुज़ारा था बड़ी मुश्किल से
फिर तेरा वादा-ए-शब याद आया
 
तेरा भूला हुआ पैमान-ए-वफ़ा
मर रहेंगे अगर अब याद आया
 
फिर कई लोग नज़र से गुज़रे
फिर कोई शहर-ए-तरब याद आया
 
हाल-ए-दिल हम भी सुनाते लेकिन
जब वो रुख़सत हुए [...]

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